Saturday, 16 December 2017

*वैदिक कालगणना और इसके मात्रक :*

*वैदिक कालगणना और इसके मात्रक :*

6 प्राण (Breath) = 1 पल (विनाडी) = 24 Seconds
60 पल (विनाडी) = 1 नाडी (= घटी = घड़ी) = 24 Minutes
2 घटी = 1 मुहूर्त्त = 1 क्षण = 48 Minutes
60 नाडी (घटी) = 30 मुहुर्त्त = 1 अहोरात्र = 24 Hours
7 अहोरात्र = 1 सप्ताह (Week)
2 सप्ताह = 1 पक्ष (fortnight)
2 पक्ष = 1 मास (Month)
2 मास = 1 ऋतु (Season)
3 ऋतु = 1 अयन
2 अयन = 1 सम्वत् = 1 वर्ष (Year)
360 वर्ष = 1 दिव्य वर्ष
सतयुग = 4800 दिव्य-वर्ष = 17,28,000 वर्ष
त्रेता = 3600 दिव्य-वर्ष = 12,96,000 वर्ष
द्वापर = 2400 दिव्य-वर्ष = 8,64,000 वर्ष
कलियुग = 1200 दिव्य-वर्ष = 4,32,000 वर्ष
चतुर्युग = महायुग = दिव्ययुग = देवयुग = (सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग)
1 चतुर्युग = 43,20,000 वर्ष
71 चतुर्युग = 1 मन्वन्तर = 30,67,20,000 वर्ष
1 सन्धिकाल = 3 चतुर्युग = 1,29,60,000 वर्ष
14 मन्वन्तर + 2 सन्धिकाल = 1000 चतुर्युग
1000 चतुर्युग = 1 सृष्टि = 1 कल्प = 1 ब्राह्म-दिन = 4 अरब 32 करोड़ वर्ष
1000 चतुर्युग = 1 प्रलय = 1 विकल्प = 1 ब्राह्म-रात्रि = 4 अरब 32 करोड़ वर्ष
2000 चतुर्युग = 1 ब्राह्म-अहोरात्र = 8 अरब 64 करोड़ वर्ष
30 ब्राह्म-अहोरात्र = 1 ब्राह्म-मास
12 ब्राह्म-मास = 1 ब्राह्म-वर्ष
100 ब्राह्म-वर्ष = 1 परा = 1 महाकल्प
मुक्ति की अवधि 1 पराकाल की होती है. [मुण्डक-उपनिषद् 3.2.6]
अभी 'श्वेत वराह' नामक प्रथम ब्राह्म-दिन के 7वें 'वैवस्वत' नामक मन्वन्तर के 28वें चतुर्युग का कलियुग चल रहा है. विक्रम सम्वत् 2073 (ईसाई वर्ष 2016) में हमारे वैदिक सम्वत् निम्नलिखित चल रहे हैं:
कल्प सम्वत् = 1,97,38,13,117 वर्ष
मानव सम्वत् = 1,96,08,53,117 वर्ष
वेद सम्वत् = 1,96,08,53,112 वर्ष
कलियुग सम्वत् = 5117 वर्ष
यूरोपीय ज्योतिषी Bailley के अनुसार, अभी कलियुग सम्वत् 5118 चल रहा है.
14 मन्वंतरों के नाम:
1. स्वायम्भुव 2. स्वारोचिष 3. औत्तमेय 4. तामस 5. रैवत 6. चाक्षुष 7. वैवस्वत 8. सावर्णि 9. दक्षसावर्णि 10. ब्रह्मसावर्णि 11. धर्मसावर्णि 12. रूद्रसावर्णि 13. देवसावर्णि (रौप्यसावर्णि) 14. इन्द्रसावर्णि (मौत्यसावर्णि)
30 कल्पों (ब्राहम-दिनों) के नाम:
1. श्वेतवाराह 2. नीललोहित 3. वामदेव 4. रथन्तर 5. रौरव 6. प्राण 7. बृहत् 8. कन्दर्प 9. सद्यः 10. ईशान 11. तमः 12. सारस्वत 13. उदान 14. गारुड 15. कौर्म 16. नरसिंह 17. समान 18. आग्नेय 19. सोम 20. मानव 21. पुमान् 22. वैकुण्ठ 23. लक्ष्मी 24. सावित्री 25. घोर 26. वाराह 27. वैराज 28. गौरी 29. माहेश्वर 30. पितृ
दिन के 15 मुहूर्त्त:
सूर्योदय से प्रथम मुहूर्त्त का प्रारम्भ होता है.
1. रुद्र 2. अहि 3. मित्र 4. पितॄ 5. वसु 6. वाराह 7. विश्वेदेवा 8. विधि 9. सतमुखी 10. पुरुहूत 11. वाहिनी 12. नक्तनकरा 13. वरुण 14. अर्यमन् 15. भग
रात्रि के 15 मुहूर्त्त:
1. गिरीश 2. अजपाद 3. अहिर्बुध्न्य 4. पुष्य 5. अश्विनी 6. यम 7. अग्नि 8. विधातृ 9. कण्ड 10. अदिति 11. जीव/अमृत 12. विष्णु 13. द्युमद्गद्युति 14. ब्रह्म 15. समुद्रम्
14 लोकों (भुवनों) के नाम:
1. भू: 2. भुवः 3. स्वः 4. मह: 5. जनः 6. तपः 7. सत्य 8. अतल 9. वितल 10. सुतल 11. तलातल 12. महातल 13. रसातल 14. पाताल
भूलोक के 7 भाग हैं, जिन्हें महाद्वीप (सप्तद्वीपा वसुमती) Continent कहते हैं:
1. जम्बूद्वीप (Asia) 2. प्लक्ष 3. शाल्मलि 4. कुश 5. क्रौन्च 6. शाक 7. पुष्कर
जम्बूद्वीप के भीतर 9 खण्ड हैं:
1. भारतवर्ष 2. इलावृत्तवर्ष 3. रम्यकवर्ष 4. हिरण्यवर्ष 5. कुरुवर्ष 6. हरिवर्ष 7. किन्नरवर्ष 8. भद्राश्ववर्ष 9. केतुमालवर्ष
आर्यावर्त्त = वर्त्तमान में भारत + पाकिस्तान + बांग्लादेश
भारतवर्ष = आर्यावर्त्त + अफगानिस्तान (गान्धार) + म्यान्मार (ब्रह्मा) + भूटान + तिब्बत (त्रिविष्टप) + नेपाल + श्रीलंका + थाईलैंड (श्याम) + मलेशिया (मलय) + वियतनाम + इंडोनेशिया
सन्दर्भ ग्रन्थ:
ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, मनुस्मृति, सूर्यसिद्धान्त आदि

*संकलन जोतिषरत्न पं देवव्रत बूट*

*ग्रहदृष्टी सूर्य सिध्दांतीय पंचांग नागपूर*

अपमृत्यु योग*

*अपमृत्यु योग*

मौत का नाम सुनते ही शरीर में अचानक सिहरन दौड़ जाती है। मृत्यु एक अटल सत्य है, जिसे कोई बदल नहीं सकता। कब, किस कारण से, किस की मौत होगी, यह कोई भी नहीं कह सकता। कुछ लोगों की अल्पायु में ही मौत हो जाती है। ऐसी मौत को अकाल मृत्यु कहते हैं। जातक की कुंडली के आधार पर अकाल मृत्यु के संबंध में जाना जा सकता है।

1- लग्नेश तथा मंगल की युति छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो जातक को शस्त्र से घाव होता है। इसी प्रकार का फल इन भावों में शनि और मंगल के होने से मिलता है।

2- यदि मंगल जन्मपत्रिका में द्वितीय भाव, सप्तम भाव अथवा अष्टम भाव में स्थित हो और उस पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो तो जातक की मृत्यु आग से होती है।

3- लग्न, द्वितीय भाव तथा बारहवें भाव में क्रूर ग्रह की स्थिति हत्या का कारण बनती है।

4- दशम भाव की नवांश राशि का स्वामी राहु अथवा केतु के साथ स्थित हो तो जातक की मृत्यु अस्वभाविक होती है।

5- यदि जातक की कुंडली के लग्न में मंगल स्थित हो और उस पर सूर्य या शनि की अथवा दोनों की दृष्टि हो तो दुर्घटना में मृत्यु होने की आशंका रहती है।

6- राहु-मंगल की युति अथवा दोनों का समसप्तक होकर एक-दूसरे से दृष्ट होना भी दुर्घटना का कारण हो सकता है।

7- षष्ठ भाव का स्वामी पापग्रह से युक्त होकर षष्ठ अथवा अष्टम भाव में हो तो दुर्घटना होने का भय रहता है।

अष्टम भाव और लग्न भाव के स्वामी बलहीन हो और मंगल ६ घर के साथ बैठा हो तो ये योग बनता है..

क्षीण चन्द्र ८ भाव में हो तो भी योग बनता है या लग्न में शनि हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो तथा उसके साथ सूर्य, चन्द्र , या सूर्य राहू हो तो भी योग बनता है..

ऐसे योंगों में मृत्यु के निम्न कारण होते है जैसे—-

१– शस्त्र से , २- विष से, ३- फांसी लगाने से , आग में जलने से , पानी में डूबने से या मोटर -वाहन दुर्घटना से .

1- यदि जातक की कुंडली के लग्न में मंगल स्थित हो और उस पर सूर्य या शनि की अथवा दोनों की दृष्टि हो तो दुर्घटना में मृत्यु होने की आशंका रहती है।

2- राहु-मंगल की युति अथवा दोनों का समसप्तक होकर एक-दूसरे से दृष्ट होना भी दुर्घटना का कारण हो सकता है।

3- षष्ठ भाव का स्वामी पापग्रह से युक्त होकर षष्ठ अथवा अष्टम भाव में हो तो दुर्घटना होने का भय रहता है।

4- लग्न, द्वितीय भाव तथा बारहवें भाव में क्रूर ग्रह की स्थिति हत्या का कारण बनती है।

5- दशम भाव की नवांश राशि का स्वामी राहु अथवा केतु के साथ स्थित हो तो जातक की मृत्यु अस्वभाविक होती है।

6- लग्नेश तथा मंगल की युति छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो जातक क शस्त्र से घाव होता है। इसी प्रकार का फल इन भावों में शनि और मंगल के होने से मिलता है।

7- यदि मंगल जन्मपत्रिका में द्वितीय भाव, सप्तम भाव अथवा अष्टम भाव में स्थित हो और उस पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो तो जातक की मृत्यु आग से होती है।
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निवारण —

लग्नेश को मजबूत करे उपाय के द्वारा और रत्ना के द्वारा और इसके बाद भी यदि दुर्घटना होती है तो सर महाम्रिन्त्युन्जय का जाप या मृत्संजनी का जाप ही ऐसे जातक को

बचा सकता है…

उदारहण के लिए श्रीमती इंदिरा गाँधी के कुंडली देखे जिनके लग्न में कर्क राशी का शनि है और ६ भाव में राहू और शुक्र …और लग्न का स्वामी चन्द्र ७ भाव में है..

क्या आप दीर्घायु होना चाहते है तो निम्न मंत्रो का ११ बार जाप करें और चमत्कार अपने आप देख्ने…..

” अश्वथामा बलीर व्यासो हनुमानाश च विभिशाना कृपाचार्य च परशुरामम सप्तैता चिरंजीवानाम ”

१ अस्वधामा २- राजा बलि ३ व्यास ऋषि , ४-अनजानी नंदन श्री राम भक्त हनुमान ५- लंका के राजा विभीषण

६- महा तपश्वी परशुराम , ७- क्रिपाचार्य .. ये सात नाम है जो अजर अमर है और आज भी पृथ्वी पर विराजमान है…

अद्भुत कवच: सफलता का मंत्र, समस्याओं का निदान—

बग्लामुखी कवच :— यह समय घोर प्रतिस्पर्धा का है। आज व्यक्ति खुद के दुखों से ज्यादा दूसरों के सुख से दु:खी है। ऎसे में मनुष्य के कई शत्रु बन जाते हैं। दूसरों से आगे निकलने की होड में व्यक्ति एक-दूसरे का दुश्मन बनता चला जाता है। यहां तक की तांत्रिक प्रयोग करवाने से भी नहीं चूकते। इसलिए हमारे ग्रन्थों में शत्रुबाधा, मुकदमा, कलह, डर इत्यादि से रक्षा करने के लिए बग्लामुखी कवच धारण करना बताया गया है। बग्लामुखी कवच धारण करने के बाद व्यक्ति पर शत्रु द्वारा किया गए सभी तांत्रिक प्रयोग विफल हो जाते हैं। इस कवच को धारण करने से शत्रु भय दूर होता है व मुकदमों में विजय होती है।
अभेद्य महामृत्युंजय कवच : —जब जन्म कुंडली में मृत्यु का योग न हो लेकिन फिर भी व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो जाए तो इसे अकाल मृत्यु कहा जाता है। हर समय किसी अनहोनी का डर लगा रहता है। इन्हीं कारणों से बचाव के लिए मां भगवती ने भगवान शिव से पूछा कि प्रभू अकाल मृत्यु से रक्षा करने और सभी प्रकार के अशुभों से रक्षा का कोई उपाय बताइए। तब भगवान शिव ने महामृत्युंजय कवच के बारे में बताया। महामृंत्युजय कवच को धारण करके मनुष्य सभी प्रकार के अशुभो से बच सकता है और अकाल मृत्यु को भी टाल सकता है।
सर्वजन वशीकरण कवच : —आकर्षण, व्यक्तित्व, मधुरता, मोहकता ये सब शब्द किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए बहुत मायने रखते हैं। आज के युग में हमें कई लोगों से मिलना पडता है जिसमें पुरूष, स्त्री, अधिकारी व अन्य तरह के लोग होते हैं। उन सब पर प्रभाव जमाने के लिए आवश्यक है कि हमारे व्यक्तित्व में कोई विशेष बात हो या हमारे चेहरे पर चुम्बकीय आर्कषण हो जिसे देखते ही सामने वाला प्रभावित हो जाए। सर्वजन वशीकरण कवच धारण करके आप महसूस करेंगे कि आपके व्यक्तित्व में एक अनोखा आर्कषण आ जाएगा। इसे धारण करने के बाद आप आर्कषण, शांति और सुकून महसूस करेंगे। साथ ही अपने आर्कषक व्यक्तित्व का परिणाम भी देखेंगे।
सौंदर्य कवच :— हर स्त्री की सदैव यही सोच बनी रहती है कि उसमें यौवन, रूप लावण्य, आर्कषण सदैव बना रहे। लेकिन कई लडकियों में विवाह योग्य उम्र हो जाने के बाद भी यौवन, रूप लावण्यता नहीं रहती है। ब्यूटी पार्लर अथवा सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल करके बढती उम्र को छुपाने की कोशिश की जाती है। तंत्र में ऎसी औरते अनंग मरू साधना द्वारा काम संतुष्टी प्राप्त कर सकती हैं। लेकिन जो औरते नौकरी या व्यवसाय में है अथवा जो मंत्र जाप या पूजा नहीं कर सकती वे सौंदर्य कवच को धारण कर अपने जीवन में यौवन व रूप लावण्यता प्राप्त कर सकती हैं। इस कवच को धारण करने से शारीरिक ही नहीं अपितु आत्मिक सुंदरता का भी विकास होता है।

अकाल मृत्यु का भय नाश करतें हैं महामृत्युञ्जय—–
ग्रहों के द्वारा पिड़ीत आम जन मानस को मुक्ती आसानी से मिल सकती है। सोमवार के व्रत में भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा की जाती है। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार सोमवार के व्रत तीन तरह के होते हैं। सोमवार, सोलह सोमवार और सौम्य प्रदोष। इस व्रत को सावन माह में आरंभ करना शुभ माना जाता है।
सावन में शिवशंकर की पूजा :—–
सावन के महीने में भगवान शंकर की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दौरान पूजन की शुरूआत महादेव के अभिषेक के साथ की जाती है। अभिषेक में महादेव को जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगाजल, गन्ना रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक के बाद बेलपत्र, समीपत्र, दूब, कुशा, कमल, नीलकमल, ऑक मदार, जंवाफूल कनेर, राई फूल आदि से शिवजी को प्रसन्न किया जाता है। इसके साथ की भोग के रूप में धतूरा, भाँग और श्रीफल महादेव को चढ़ाया जाता है।
क्यों किया जाता है महादेव का अभिषेक ????
महादेव का अभिषेक करने के पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख है कि समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकलने के बाद जब महादेव इस विष का पान करते हैं तो वह मूर्चि्छत हो जाते हैं। उनकी दशा देखकर सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं और उन्हें होश में लाने के लिए निकट में जो चीजें उपलब्ध होती हैं, उनसे महादेव को स्नान कराने लगते हैं। इसके बाद से ही जल से लेकर तमाम उन चीजों से महादेव का अभिषेक किया जाता है।
‘मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्ये’
इसके पश्चात निम्न मंत्र से ध्यान करें-
‘ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥
ध्यान के पश्चात ‘ऊँ नम: शिवाय’ से शिवजी का तथा ‘ऊँ नम: शिवायै’ के अलावा जन साधारण को महामृत्युञ्जय मंत्र का जप करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है । अत: शिव-पार्वती जी का षोडशोपचार पूजन कर राशियों के अनुसार दिये मंत्र से अलग-अलग प्रकार से पुष्प अर्पित करें।
राशियों के अनुसार क्या चढ़ावें भगवान शिव को..????
भगवान शिव को भक्त प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र और समीपत्र चढ़ाते हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार जब 88 हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता ब्रह्मा से पूछी तो ब्रह्मदेव ने बताया कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक समीपत्र का महत्व होता है।
मेष:-ऊँ ह्रौं जूं स:, इस त्र्यक्षरी महामृत्युछञ्जय मंत्र बोलते हुए 11 बेलपत्र चढ़ावें।
वृषभ: ऊँ शशीशेषराय नम: इस मंत्र से 84 शमीपत्र चढ़ावें।
मिथुन: ऊँ महा कालेश्वराय नम: (बेलपत्र 51)।
कर्क: ऊँ त्र्यम्बकाय नम: (नील कमल 61)।
सिंह: ऊँ व्योमाय पाय्र्याय नम: (मंदार पुष्प 108)
कन्या: ऊँ नम: कैलाश वासिने नंदिकेश्वराय नम:(शमी पत्र 41)
तुला: ऊँ शशिमौलिने नम: (बेलपत्र 81) वृश्चिक:
ऊँ महाकालेश्वराय नम: ( नील कमल 11 फूल)
धनु: ऊँ कपालिक भैरवाय नम: (जंवाफूल कनेर108)
मकर : ऊँ भव्याय मयोभवाय नम: (गन्ना रस और बेल पत्र 108)
कुम्भ: ऊँ कृत्सनाय नम: (शमी पत्र 108)
मीन: पिंङगलाय नम: (बेलपत्र में पीला चंदन से राम नाम लिख कर 108)

सावन सोमवार व्रत नियमित रूप से करने पर भगवान शिव तथा देवी पार्वती की अनुकम्पा बनी रहती है।जीवन धन-धान्य से भर जाता है।
सभी अनिष्टों का भगवान शिव हरण कर भक्तों के कष्टों को दूर करते हैं।

*संकलन जोतिषरत्न पं देवव्रत बूट*

*ग्रहदृष्टी सूर्य सिध्दांतीय पंचांग नागपूर*

Wednesday, 6 December 2017

हरिर्हरतिपापानि दुष्टचित्तैरपिस्मृतः /
अनियच्छापिसंस्पृष्टोदहत्येवहिपावकः //
जिव्हाग्रेवसतेयस्य हरिरित्यक्षरद्वयम् /सविष्णुलोकमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम् //
ज्याच्या जिभेच्या अग्रावर'हरि,ही दोन अक्षरं वास करतात,तोपुनरावृत्ती रहित अशा विष्णुधामास जातो. अग्नि व ब्राम्हणाचं मुख यात भगवान विष्णुंना भक्ती पूर्वक आहुती  दिल्यास भगवान प्रसन्न होतात.

Sunday, 3 December 2017

दत्त स्तुती

                     ॥श्रीः॥

   *॥मंत्रात्मकश्लोका॥*
अनसूयात्रिसंभूतोदत्तात्रेयोदिगंबरः॥
स्मर्तृगामीस्वभक्तानामुद्धर्ताभवसंकटात्॥१॥
दरिद्रविप्रगेहेयःशाकंभुक्त्वोत्तमश्रियम्॥
ददौश्रीदत्तदेवःसदारिद्र्याच्छ्रीप्रदोऽवतु॥२॥
दूरीकृत्यपिशाचार्तिजीवयित्वामृतंसुतम्॥
योभृदभीष्टदःपातुसनःसंतानवृद्धिकृत्॥३॥
जीवयामासभर्तारंमृतंसत्याहिमृत्युहा॥
मृत्युंजयःसयोगींद्रःसौभाग्यंमेप्रयच्छतु॥४॥
अत्रेरात्मप्रदानेनयोमुक्तोभगवानृणात्॥
दत्तात्रेयंतंमीशानंनमामिऋणमुक्तये॥५॥
जपेच्छ्लोकमिमंदेवपित्रर्षिपुंनृणापहम्॥
सोऽनृणोदत्तकृपयापरंब्रह्माधिगच्छति॥६॥
अत्रिपुत्रोमहातेजादत्तात्रेयोमहामुनिः॥
तस्यस्मरणमात्रेणसर्वपापैःप्रमुच्यते॥७॥
नमस्तेभगवन्देवदत्तात्रेयजगत्प्रभो॥
सर्वबाधाप्रशमनंकुरुशांतिंप्रयच्छमे॥८॥
अनसूयासुतश्रीशजनपातकनाशन॥
दिगंबरनमोनित्यंतुभ्यंतेवरदोभव॥९॥
श्रीविष्णोरवतारोऽयंदत्तात्रेयोदिगंबरः॥
मालाकमंडलूच्छडमरूशङ्खचक्रधृक्॥१०॥
नमस्तेशारदेदेविसरस्वतिमतिप्रदे॥
वसत्वंममजिव्हाग्रेसर्वविद्याप्रदाभव॥११॥
दत्तात्रेयंप्रपद्येशरणमनुदिनंदीनबंधुंमुकुंदम्
नैर्गुण्येसंनिविष्टंपथिपरमपदंबोधयतंमुनीनाम्॥
भस्माभ्यङ्गंजटाभिःसुललितमुकुटंदिक्पटंदिव्यरूपम्
सह्याद्रौनित्यवासंप्रमुदितममलंसद्गुरुंचारुशीलम्॥१२॥

Saturday, 25 November 2017

संततीसाठी

विष्णुश्राद्ध विधान करावे व.कुलदेवतेला अभिषेक
नंतर गर्भधारणा झाल्यावर दरमहीन्याला गर्भरक्षण बलि करणे

Friday, 24 November 2017

लकवा उपचार

नरसोबावाडीच्या ता.शिरोल जि.कोल्हापुर पासून
१० कि.मी.अंतरावर
अखिवाट म्हणून गाव आहे,
त्या गावा मध्ये
श्री गायकवाड़ म्हणून आयर्वेदिक वैद्य आहेत,
ते फक्त लकव्या वरच औषध देतात,
लकवा कितीही पण जूना असू द्या,पेशंटला जर तिथ पर्यन्त नेण शक्य नसेल,
तर पेशंटचे केस पेपर्स त्यांच्या नातेवाईकांनी तिथे घेऊन जा,
आणि आजार किती जूना हे सांगा,६ महिन्यांचे फक्त ८००/-रुपये घेतले जातात
आपल्याकडून जर कोणाचा जीव वाचत असेल,तर या पेक्षा दुसरी कुठली सेवा असेल.
धन्यवाद.
- वसंत रामू गायकवाड
Ph. 02322 238 475-

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Wednesday, 22 November 2017

व्यावहारिक संस्कृत शब्दावली -

खराब मनुष्य - दुर्जन: / खलः / कापुरूष:

आगे रहनेवाला – पुरश्चर: / अग्रेसर: / पुरोग: / पुरोगमः / नायक: / नेतृ / पुरोगामीन्
शिष्य का शिष्य - प्रशिष्यः
दारू नशाखोर - मद्यपः

व्यभिचारी पुरुष – लम्पट: / लुब्धकः
परदेशी - वैदेशिक:
नया छात्र – शैक्षः
कदर करनेवाला - रसज्ञ: / सहृदय:
आग बुझानेवाला - अग्निशामक:
स्टेनोग्राफर – आशुलिपिक:
फासी देनेवाला - वधकः
इलाका = क्षेत्रम् / विस्तार:
इकाई – घटक:
अजब - विचित्रम्
मरनेवाला - मरणासन्न:
मरम्मत – समीकरणम्
जंजाल – व्यामोह:
मरीज – रोगी
बापदादा - पूर्वजा:
बालिग - वयस्क:
नाबालिग – किशोरावस्था
दिक्कत - काठिन्यम्
कुर्बानी - त्याग
कुली – भारिक:
कैदी - बंधक:

एतदीयः - इसका, तदीयः - उसका, यदीयः - जिसका, परकीयः (अन्यदीयः) - दूसरे का, आत्मीयः (स्वकीयः, स्वीयः) - अपना।

महत् - महान्, यावत् - जितना, तावत् - उतना, कियत् - कितना, एतावत् (इयत्) - इतना।

तत्र - वहाँ,
अत्र - यहाँ,
कुत्र - कहाँ,
यत्र - जहाँ,
कुत्रापि - कहीं भी,
अन्यत्र - दूसरे स्थान पर, सर्वत्र - सब स्थानों पर,
उभयत्र - दोनों स्थानों पर, अत्रैव - यहीं पर, तत्रैव - वहीं पर,
यत्र-कुत्रापि - जहाँ­ कहीं भी,

इतः - यहाँ से,
ततः - वहाँ से,
कुतः - कहाँ से,
कुतश्चित् - कहीं से,
यतः - जहाँ से,
इतस्ततः - इधर-उधर, सर्वतः - सब ओर से, उभयतः - दोनों ओर से,

उपरि - ऊपर,
अधः - नीचे,
अग्रे, (पुरः, पुरस्तात्) - आगे, पश्चात् - पीछे,
बहिः - बाहर,
अन्तः - भीतर,
उपरि-अधः - ऊपर-नीचे,

इदानीम् (सम्प्रति, अधुना) - अब / इस समय, तदा / तदानीम् - तब / उस समय, कदा - कब,
यदा - जब,
सदा (सर्वदा) - हमेशा, एकदा - एक समय, कदाचित् - कभी, क्व - कब, क्वापि - कभी भी,
सद्यः - तत्काल (अतिशीघ्र), पुनः - फिर, अद्य - आज,
अद्यैव - आज ही,
अद्यापि - आज भी,

श्वः - आने वाला कल,
ह्यः - बीता हुआ कल, परश्वः - आने वाला परसों, परह्य: - बीता हुआ परसों, प्रपरश्वः - आने वाला नरसों,
प्रपरह्य: - बीता हुआ नरसों,

शीघ्रम् - जल्दी,
शनैः शनैः - धीरे-धीरे,
पुनः पुनः - बार-बार, युगपत् - एक ही समय में, सकृत् - एक बार,
असकृत् - अनेक बार, अनन्तरम् - इसके बाद, कियत् कालम् - कब तक,
एतावत् कालम् - अब तक, तावत् कालम् - तब तक, यावत् कालम् - जब तक, अद्यावधि - आज तक,

कथम् - कैसे / किस प्रकार, इत्थम् - ऐसे / इस प्रकार,
यथा - जैसे, तथा - वैसे / उस प्रकार,
सर्वथा - सब तरह से, अन्यथा - नहीं तो / अन्य प्रकार से, कथञ्चित्, कथमपि - किसी भी प्रकार से, यथा यथा - जैसे-जैसे, तथा-तथा - वैसे-वैसे, यथा-कथञ्चित् - जिस किसी प्रकार से,
तथैव - उसी प्रकार,
बहुधा / प्रायः - अक्सर।

स्वयम् - खुद,
वस्तुतः - असल में,
कदाचित् (सम्भवतः) - शायद,
सम्यक् - अच्छी तरह, सहसा (अकस्मात्) - अचानक, वृथा - व्यर्थ, समक्षम् (प्रत्यक्षम्) - सामने­,
मन्दम् - धीरे, च - और, अपि - भी, वा / अथवा - या, किम् - क्या,
प्रत्युत (अपितु) - बल्कि, यतः - चूँकि,
यत् - कि,
यदि - अगर,
तथापि - तो भी / फिर भी,

हि - क्योंकि,
विना - बिना,
ऋते - सिवाय / के बिना,
कृते - के लिए / वास्ते,
सह - साथ,
प्रभृति - से लेकर,
पर्यन्तम् - तक, (यहाँ से यहाँ तक),
ईषत् - थोडा,

न - नहीं,
मा - मत,
अलम् - बस,
आम् - हाँ,
बाढम् - बहुत अच्छा,
अथ किम् - और क्या ?