Wednesday, 6 September 2017
*ज्योतिषशास्त्र* ---------------------- *बृहज्जातक*( मराठी ) *भाग : २* *💢राशींच्या दुसर्या काही संज्ञा* मेष -- किय, वृषभ -- तावुरि, मिथुन -- जितुमु, कर्क -- कुलीर, सिंह -- लेय, कन्या -- पाथोन, तूळ -- जूक, वृश्चिक -- कौपी, धनु -- तौक्षिक, मकर -- आकोकेर, कुंभ -- हद्रोग, मीन -- अंत्यभ अशा मेषादि राशींच्या आणखीं संज्ञा आहेत. ॥८॥ इं. क ( संबंध राशिचक्र ३६० अंशांचे, त्यांत १२ राशी म्हणून प्रत्येक राशि ३० - ३ असते ) प्रत्येक राशीचे सारखे ३ भाग केले असतां एक - एक भाग १५ अंशांचा होती अशा प्रत्येक भागास होरा असें म्हणतात. अर्थात् एका राशींत २ होरा असतात. क्षेत्र ( गृह ) होरा, द्रेष्काण, नवांश, द्वादशांश, त्रिंशांश अशा ( षड्वर्ग ) प्रकारांनी शुभाशुभफलांचा निर्णय करतात. ह्या ६ प्रकारांना शास्त्रकर्त्यांनी '' वर्ग '' असे नामाभिधान ठेवले आहे. '' होरा '' ही संज्ञा बहुधा सर्व ठिकाणी व सर्व ज्योतिषी राशीच्या अर्ध्या भागासच लावतात. क्वचित् लग्नासही लावतात असें ग्रंथकार म्हणतात परंतु तशी प्रथा कोठेंही आढळून येत नाही. हे ६ प्रकार अगर बर्ग ज्या राशीचा नावाचे असतात त्या राशीचा जो स्वामी ( अधिपति ) तोच त्या वर्गाचा अधिपति असतो. --------------------------------------------- 💢 *दिवाबली, रात्रिबली शीर्षोदयादी राशी* अर्थ -- मेष, वृषभ, धनु, कर्क, मिथुन आणि मकर ह्या राशी रात्रिबली व बाकीच्या दिवाबली समजाव्या. रात्रिबली लग्नास पृष्ठोदय राशी आणि दिवाबली लग्नास शीर्षोदय राशी म्हणतात. त्यांतील मीन व मिथुन हीं दोन लग्नें पृष्ठोदय व शीर्षोदय अशीं दुहेरी आहेत. म्हणून त्यांस उभयोदय अशी संज्ञा दिली आहे. -----------------श्रीधर------------------- *💢 होरा देष्काणादी सिद्धी* मेषादि बारा राशीपैकी ( १ - ३ - ५ - ७ - ९ - ११ ) ह्या विषमराशी असून त्यातील काही क्रूर ( उग्र ) आहेत व वृषभादि ( २ - ४ - ६ - ८ - १२ ) ह्या सम राशि असून त्यांतील वृश्चिक राशीशिवाय बाकी सर्व सौम्य स्वरुपाच्या आहेत. मेष, कर्क, तुला आणि मकर ह्या चर राशि होत. वृषण, सिंह, वृश्चिक आणि कुंभ ह्या स्थिर राशी समजाव्या. मिथुन, कन्या, धनु आणि मीन ह्या राशी पूर्वाधी स्थित व उत्तराधी चर असतात. म्हणून त्यांस द्विःस्वभावराशि म्हणतात. मेष, सिंह आणि धनु ह्या पूर्व दिशेच्या राशी होत. वृषभ, कन्या, मकर ह्या दक्षिण दिशेच्या; मिथुन, तुला, कुंभ ह्या पश्चिम दिशेच्या व कर्क, वृश्चिक, मीन ह्या उत्तर दिशेच्या राशी समजाव्या. त्यांचे जे अधिपती ते दिशाधिपति होत. मेषादि विषमराशींत पहिला होरा सूर्याचा व दूसरा चंद्राचा आणि वृषभादि समराशींत पहिला होरा चंद्राचा व दुसरा सूर्याचा, अर्थात् होराधिपति तेच ग्रह होतो. राशीचा जो स्वामी तोच ख्या राशीच्या पहिल्या द्रेष्काणाचा अधिपति. राशीपासून पांचव्या स्थानाचा जो अधिपति तो त्याच्या दुसर्या द्रेष्काणाच्या स्वामी आणि यापासून नवम स्थानाचा अधिपति तो त्याच्या तिसर्या द्रेष्काणाचा स्वामी असते. क्षेत्र - राशि - लग्न हें कुंडलींतील पाहिलें स्थान, त्यापासून पुढें बाराही स्थानें अनुक्रमानें समजावीं. त्यांना तनु, धन, सहज, सुहत् इत्यादि संज्ञा अनुक्रमानें आहेत. -----------------------श्री कु------------------- *💢 मतांतराने होराधिपती* पूर्वी होरानिर्णय सांगितला आहे व तो सर्वमान्य आहे. तथापि पहिला होरा लग्नाधिपतीचा व दुसरा एकादश - स्थानधिपतीचा, त्याचप्रमाणें पहिला द्रेष्काण लग्नाधिपतीचा, दुसरा द्वादश - स्थानाधिपतीचा व तिसरा एकादश -- स्थानाधिपतीचा असें क्वचित् -- कांही आचार्याचें मत आहे. परंतु तें प्रचारांत नाहीं. ॥१२॥ =======================💢 *श्रीधर कुलकर्णी* ९६६५६३२९५३
काहि दिवसापुर्वी मी पाठवलेले पितृस्तोत्रात काही त्रुटी होत्या ते.संपूर्ण स्तोत्र वे मंदारजी खळदकर यांनी पाठवलेले येथे टाकत आहे मार्कंडेय व.रुची यांचे संवादात्मक आहे पित्रृस्तोत्र मार्कण्डेय उवाच एवं तु स्तुवतस्तस्य तेजसो राशिरुच्छ्रितः । प्रादुर्बभूव सहसा गगनव्याप्तिकारकः ॥ ३७ ॥ तद् दृष्ट्वा सुमहत्तेजः समाच्छाद्य स्थितं जगत् । जानुभ्यामवनीं गत्वा रुचिः स्तोत्रमिदं जगौ ॥ ३८ ॥ रुचिरुवाच अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् । नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम् ॥ १ ॥ इद्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा । सप्तर्षीणां तथान्येषां तान्नमस्यामि कामदान् ॥ २ ॥ मन्वादीनां च नेतारः सूर्याचन्द्रमसोस्तथा । तान्नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्युदधावपि ॥ ३ ॥ नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा । द्दावापृथिव्योश्र्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलिः ॥ ४ ॥ प्रजापतेः कश्यपाय सोमाय वरुणाय च । योगेश्र्वरेभ्यश्र्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलिः ॥ ५ ॥ नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु । स्वायम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ॥ ६ ॥ सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा । नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ॥ ७ ॥ अग्निरुपांस्तथैवान्यात्रमस्यामि पितृनहम् । अग्निसोममयं विश्र्वं यत एतदशेषतः ॥ ८ ॥ ये च तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः । जगत्स्वरुपिणश्र्चैव तथा ब्रह्मस्वरुपिणः ॥ ९ ॥ तेभ्योsखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः । नमो नमो नमस्तेsतु प्रसीदन्तु स्वधाभुजः ॥ १० ॥ मार्कण्डेय उवाच एवं स्तुतास्ततस्तेन तेजसो मुनिसत्तमाः । निश्र्चक्रमुस्ते पितरो भासयन्तो दिशो दश ॥ ११ ॥ निवेदनं च यत्तेन पुष्पगन्धानुलेपनम् । तद्भूषितानथ स तान् ददृशे पुरतः स्थितान् ॥ १२ ॥ प्रणिपत्य रुचिर्भक्त्या पुनरेव कृताञ्जलिः । नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यमित्याह पृथगादृतः ॥ १३ ॥ ॥ इति श्री गरुड पुराणे रुचिकृतं पितृस्तोत्रं संपूर्णम् ॥
Monday, 4 September 2017
कैसे बना राहू ग्रह ?
क्या है राहू ? हिरन्यकश्यप की सिंहिका नामक पुत्री का विवाह विप्रचिति नामक दानव के साथ हुआ था उसी के गर्भ से राहु ने जन्म लिया। विप्रचिति हमेशा दानवी शक्तियों, आसुरी शक्तियों से दूर रहे और साथ ही समुद्र मंथन के समय अमृतपान के कारण राहु को अमरत्व एवं देवत्व की प्राप्ति हुई। तभी से शिव भक्त राहु अन्य ग्रहों के साथ ब्रह्मा जी की सभा में विराजमान रहते हैं इसलिए इन्हें ग्रह के रूप में मान्यता मिली। क्या है राहू ? जन्मकुंडली में राहु पूर्व जन्म के कर्मों के बारे में बताता है। राहु परिवर्तनशील, अस्थिर प्रकृति का ग्रह माना जाता है। राहु में अंतर्दृष्टि भी होती है ताकि वह काल की रचनाओं के बारे में सोच सके बता सके। भौतिक दृष्टि से इसका कोई रंग, रूप, आकार नहीं है, इसकी कोई राशि, वार नहीं होता। वैदिक ज्योतिषियों ने इसकी स्वराशि, उच्च राशि और मूलत्रिकोण राशियों की कल्पना की है। जातक परिजात में राहु की उच्च राशि मिथुन, मूलत्रिकोण कुंभ और स्वराशि कन्या मानी गई है। राहु का व्यवहार अत्यंत प्रभावशाली देखा गया है। राहु पूर्वाभास की योग्यता भी विकसित करता है। विशेषकर जब राहु जल राशियों कर्क, वृश्चिक, मीन में हो और उस पर बृहस्पति की दृष्टि हो। राहु छुपे हुए रहस्यों, तंत्र, मंत्र, काला जादू व भूत प्रेत का कारक भी है। राहु की तामसिक प्रवृत्ति के कारण वह चालाक है और व्यक्ति को भौतिकता की ओर पूर्णतया अग्रसर करता है, बहुत महत्वाकांक्षी व लालची बनाता है, जिसके लिए व्यक्ति साम-दाम-दंड-भेद की नीतियां अपनाकर जीवन में आगे बढ़ता है। इसी तरह यह व्यक्ति को भ्रमित भी रखता है। एक के बाद दूसरी इच्छाओं को जागृत करता है। इन्हीं इच्छाओं की पूर्ति हेतु वह विभिन्न धार्मिक कार्य व यात्राएं भी करता है। राहु प्रधान व्यक्ति में दिखावा करने की प्रवृत्ति विशेष रूप से पायी जाती है। राहु कार्य जाल में फंसाता है, जीवन में आकर्षण को बनाये रखता है, हार नहीं मानता अर्थात इच्छा शक्ति को जागृत रखता है। राहु का योग जन्म पत्रिका में जिस ग्रह के साथ होगा उसी में विकार उत्पन्न हो जायेगा और केतु का योग जिस ग्रह के साथ होगा उसकी काट होगी। उसका दोष कम हो जायेगा। कोई भी ग्रह राहु के मुख में होगा उस व्यक्ति का व्यवहार उस भाव से संबंधित असंयमित हो जायेगा। सूर्य के निकट रहने पर राहु सूर्य का सारा बल ग्रहण कर लेता है । इस प्रकार राहु चंद्र के साथ मन की स्थिति बहुत अव्यवस्थित करके मन में उथल-पुथल मचा देता है। विचारों और भावनाओं में विकार उत्पन्न हो जाता है। ऐसा देखने में आया है कि जिन जातकों की जन्मपत्रिका में राहु और चंद्रमा की युति हो वे बहुत परेशान देखे गये हैं, मानसिक सामंजस्यता की बेहद कमी देखी गयी है। अन्य पाप ग्रहों का भी दृष्टि या युति संबंध हो तो मानसिक रोगी व पागलपन की स्थिति भी देखी गयी है। राहु गुरु के साथ मिलकर गुरु चांडाल योग का निर्माण करता है जो विवाह व ज्ञान प्राप्ति में बाधा बन जाता है। इस प्रकार राहु सभी ग्रहों के साथ युति करके किसी न किसी प्रकार का विकार उत्पन्न करता है। किंतु यह सब फल राहु की दशा अंतर्दशा आने पर ही मिलते हैं। मित्र राशियों में शुभ व शत्रु राशियों में अशुभ फल देते हैं। राहु के परिणाम शुभ मिलेंगे या अशुभ यह मूलतः नक्षत्रों द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। राहु के अपने नक्षत्र हैं आद्रा, स्वाति एवं शतभिषा। इन नक्षत्रों में राहु रहने पर शुभ परिणाम देता है।
Sunday, 3 September 2017
॥ श्रीगणेशमहिम्नःस्तोत्रम् ॥
।।श्री गणेशाय नमः।। ।।श्रीमदसद्गुरुवे नमः।। अनिर्वाच्यं रूपं स्तवन-निकरो यत्र गलित- स्तथा वक्ष्ये स्तोत्रं प्रथमपुरुषस्याऽत्र महतः । यतो जातं विश्वं स्थितमपि सदा यत्र विलयः स कीदृग्गीर्वाणः सुनिगमनुतः श्रीगणपतिः ॥ १॥ गणेशं गाणेशाः शिवमिति च शैवाश्च विबुधा रविं सौरा विष्णुं प्रथमपुरुषं विष्णुभजकाः । वदन्त्येके शाक्ता जगदुदयमूलां परिशिवां न जाने किं तस्मै नम इति परं ब्रह्म सकलम् ॥ २॥ तथेशं योगज्ञा गणपतिमिमं कर्म निखिलं समीमांसा वेदान्तिन इति परं ब्रह्म सकलम् । अजां सांख्यो ब्रूते सकलगुणरूपां च सततं प्रकर्तारं न्यायस्त्वथ जगति बौद्धा धियमिति ॥ ३॥ कथं ज्ञेयो बुद्धेः परतर इयं बाह्यसरणिर्यथा धीर्यस्य स्यात् स च तदनुरूपो गणपतिः । महत्कृत्यं तस्य स्वयमपि महान् सूक्ष्ममणुवद् ध्वनिर्ज्योतिर्बिन्दुर्गगनसदृशः किं च सदसत् ॥ ४॥ अनेकास्योऽपाराक्षि- करचरणोऽनन्त-हृदयस्तथा नानारूपो विविधवदनः श्रीगणपतिः । अनन्ताह्वः शक्त्या विविधगुणकर्मैकसमये त्वसंख्यातानन्ताभिमत- फलदोऽनेकविषये ॥ ५॥ न यस्याऽन्तो मध्यो न च भवति चादिः सुमहतामलिप्तः कृत्वेत्थं सकलमपि खंवत् स च पृथक् । स्मृतः संस्मर्तॄणां सकलहृदयस्थः प्रियकरो नमस्तस्मै देवाय सकलसुरवन्द्याय महते ॥ ६॥ गणेशाद्यं बीजं दहन-वनिता-पल्लवयुतं मनुश्चैकार्णोऽयं प्रणवसहितोऽभीष्टफलदम् । सबिन्दुश्चागाद्याङ्गणकऋषिछन्दोऽस्य च निचृत् स देवः प्राग्बीजं विपदपि च शक्तिर्जपकृताम् ॥ ७॥ गकारो हेरम्बः सगुण इति पुनिर्गुणमयो द्विधाऽप्येको जातः प्रकृतिपुरुषो ब्रह्म हि गणः । स चेशश्चोत्पत्ति-स्थिति- लयकरोऽयं प्रथमको यतो भूतं भव्यं भवति पतिरीशो गणपतिः ॥ ८॥ गकारः कण्ठोर्ध्व गजमुखसमो मर्त्यसदृशो णकारः कण्डाधो जठरसदृशाकार इति च । अधोभागः कट्यां चरण इति हीशोऽस्य च तनु- र्विभातीत्थं नाम त्रिभुवनसमं भूर्भुवःसुवः ॥ ९॥ गणेशेति त्र्यर्णात्मकमपि वरं नाम सुखदं सकृत्प्रोच्चैरुच्चारितमिति नृभिः पावनकरम् । गणेशस्यैकस्य प्रतिजपकरस्यास्य सुकृतं न विज्ञातो नाम्नः सकलमहिमा कीदृशविधः ॥ १०॥ गणेशेत्याह्वां यः प्रवदति मुहुस्तस्य पुरतः प्रपश्यँस्तद्वक्त्रं स्वयमपि गणस्तिष्ठति तदा । स्वरूपस्य ज्ञानं त्वमुक इति नाम्नाऽस्य भवति प्रबोधः सुप्तस्य त्वखिलमिह सामर्थ्यममुना ॥ ११॥ गणेशो विश्वेऽस्मिन् स्थित इह च विश्वं गणपतौ गणेशो यत्रास्ते धृति- मतिरनैश्वर्यमखिलम् । समुक्तं नामैकं गणपतिपदं मंगलमयं तदेकास्यं दृष्टेः सकल-विबुधास्येक्षण- समम् ॥ १२॥ बहुक्लेशैर्व्याप्तः स्मृत उत गणेशे च हृदये क्षणात् क्लेशान् मुक्तोभवति सहसा त्वभ्रचयवत् । बने विद्यारम्भे युधि रिपुभये कुत्र गमने प्रवेशे प्राणान्ते गणपतिपदं चाऽऽशु विशति ॥ १३॥ गणाध्यक्षो ज्येष्ठः कपिल अपरो मंगलनिधि- र्दयालुर्हेरमबो वरद इति चिन्तामणिरजः । वरानीशो ढुण्ढिर्गजवदननामा शिवसुतो मयूरेशो गौरीतनय इति नामानि पठति ॥ १४॥ महेशोऽयं विष्णुः सकविरविरिन्दुः कमलजः क्षितिस्तोयं वह्निः श्वसन इति खं त्वद्रिरूदधिः । कुजस्तारः शुक्रो गुरुरुडुबुधोऽगुश्च धनदो यमः पाशो काव्यः शनिरखिलरूपो गणपतिः ॥ १५॥ मुखं वह्विः पादौ हरिरपि विधाता प्रजननं रविर्नेत्रे चन्द्रो हृदयमपि कामोऽस्य मदनः । करौ शक्रः कट्यामवनिरूदरं भाति दशनं गणेशस्यासन् वै क्रतुमयवपुश्चैव सकलम् ॥ १६॥ अनर्ध्यालंकारैररुण-वसनैर्भूषित- तनुः करीन्द्रास्यः सिंहासनमुपगतो भाति बुधराट् । स्थितः स्यात्तन्मध्येऽप्युदित- रविबिम्बोपम-रुचिः स्थिता सिद्धिर्वामे मतिरितरगा चामरकरा ॥ १७॥ समन्तात्तस्यासन् प्रवरमुनिसिद्धाः सुरगणाः प्रशंसन्तीत्यग्रे विविधनुतिभिः साऽञ्जलिपुटाः । बिडौजाद्यैर्ब्रह्मादिभिरनुवृतो भक्तनिकरै- र्गणक्रीडामोद-प्रमुद-विकटाद्यैः सहचरैः ॥ १८॥ वशित्वाद्यष्टाष्टादश-दिगखिलाल्लोलमनुवाग् धृतिः पादूः खड्गोऽञ्जनरसबलाः सिद्धय इमाः । सदा पृष्ठे तिष्टन्त्यानिमिषिदृशस्तन्मुखलया गणेशं सेवन्तेऽत्यतिनिकटसूपायनकराः ॥ १९॥ मृगांकास्या रम्भाप्रभृतिगणिका यस्य पुरतः सुसंगीत कुर्वन्त्यपि कुतुकगन्धर्वसहिताः । मुदः पारो नाऽत्रेत्यनुपमपदे दोर्विगलिता स्थिरं जातं चित्तं चरणमवलोक्यास्य विमलम् ॥ २०॥ हरेणाऽयं ध्यातस्त्रिपुरमथने चाऽसुरवधे गणेशः पार्वत्या बलिविजयकालेऽपि हरिणा । विधात्रा संसृष्टावुरगपतिना क्षोणिधरणे नरैः सिद्धौ मुक्तौ त्रिभुवनजये पुष्पधनुषा ॥ २१॥ अयं सुप्रासादे सुर इव निजानन्दभुवने महान् श्रीमानाद्यो लघुतरगृहे रंकसदृशः । शिवद्वारे द्वाःस्थो नृप इव सदा भूपतिगृहे स्थितो भूत्वोमांके शिशुगणपतिर्लालनपरः ॥ २२॥ अमुष्मिन् सन्तुष्टे गजवदन एवापि विबुधे ततस्ते सन्तुष्टास्त्रिभुवनगताः स्युर्बुधगणाः । दयालुर्हेरम्बो न च भवति यस्मिंश्च पुरुषे वृथा सर्वं तस्य प्रजननमतः सान्द्रतमसि ॥ २३॥ वरेण्यो भूशुण्डिर्भृगु-गुरु-कुजा-मुद्गलमुखा ह्यपारास्तद्भक्ता जप-हवन-पूजा-स्तुतिपराः । गणेशोऽयं भक्तप्रिय इति च सर्वत्र गदितं विभक्तिर्यत्रास्ते स्वयमपि सदा तिष्ठति गणः ॥ २४॥ मृदः काश्चिद्धातोश्छद- विलिखिता वाऽपि दृषदः स्मृता व्याजान्मूर्तिः पथि यदि बहिर्येन सहसा । अशुद्धोऽद्धा द्रष्टा प्रवदति तदाह्वां गणपतेः श्रुत्वा शुद्धो मर्त्यो भवति दुरिताद् विस्मय इति ॥ २५॥ बहिर्द्वारस्योर्ध्वं गजवदन-वर्ष्मेन्धनमयं प्रशस्तं वा कृत्वा विविध कुशलैस्तत्र निहितम् । प्रभावात्तन्मूर्त्या भवति सदनं मंगलमयं विलोक्यानन्दस्तां भवति जगतो विस्मय इति ॥ २६॥ सिते भाद्रे मासे प्रतिशरदि मध्याह्नसमये मृदो मूर्ति कृत्वा गणपतितिथौ ढुण्ढिसदृशीम् । समर्चन्त्युत्साहः प्रभवति महान् सर्व सदने विलोक्यानन्दस्ताम् प्रभवति नृणां विस्मय इति ॥२७।। तथा ह्येकः श्लोको वरयति महिम्नो गणपतेः कथं स श्लोके ऽस्मिन् स्तुत इति भवेत् सम्प्रपठिते । स्मृतं नामास्यैकं सकृदिदमनन्ताह्वयसमं यतो यस्यैकस्य स्तवनसदृशं नाऽन्यदपरम् ॥ २८॥ गजवदन विभो यद्- वर्णितं वैभवं ते त्विह जनुषि ममेत्थं चारु तद्दर्शयाशु । त्वमसि च करुणायाः सागरः कृत्स्नदाता- अप्यति तव भृतकोऽहं सर्वदा चिन्तकोऽस्मि ॥ २९॥ सुस्तोत्रं प्रपठतु नित्यमेतदेव स्वानन्दं प्रति गमनेऽप्ययं सुमार्गः । सचिन्त्यं स्वमनसि तत्पदारविन्दं स्थाप्याग्रे स्तवनफलं नतीः करिष्ये ॥ ३०॥ गणेशदेवस्यं महात्म्यमेतद् यः श्रावयेद्वाऽपि पठेच्च तस्य । क्लेशा लयं यान्ति लभेच्च शीघ्रं स्त्री-पुत्र- विद्यार्थ-गृहं च मुक्तिम् ॥ ३१॥ ॥ इति श्रीपुष्पदन्तविरचितं श्रीगणेशमहिम्नः स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ ।।श्रीमदगणेशार्पणमस्तु।। ।।श्रीमदसद्गुरुपादार्पणमस्तु।। 🌺🌺🌺🏵️🏵️🏵️🌺🌺🌺🏵️🏵️🏵️🌺🌺🌺